कविताएँ – सीमा शर्मा ‘सरहद’

इन कविताओं में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं हैं,
बल्कि अनुभव, स्मृति और समय से संवाद करते हुए
जीवन की परतों को खोलते हैं।



आप की आँखों का तारा और है

आप की आँखों का तारा और है
क्या हुआ मेरा सहारा और है

इक नदी के दो किनारों की तरह
रास्ता मेरा तुम्हारा और है

जाने अब कैसी ख़बर ये लाएँगी
इन हवाओं का इशारा और है

आप मरहम ही लगाते रह गए
क्या कहें ये दर्द सारा और है

आप की बदली निगाहें कह रहीं
अब नहीं मेरा गुज़ारा और है

पूछने वालों को ‘सरहद’ ने कहा
मैं नहीं गर्दिश का मारा और है

दूरी और बिछड़ाव


हम को आदत क़सम निभाने की

हम को आदत क़सम निभाने की
उन की फ़ितरत है भूल जाने की

सर झुका कर मैं क्यूँ नहीं जीती
बस शिकायत यही ज़माने की

उस की शर्तों पे मुझ को है जीना
कैसी दीवानगी दिवाने की

उस को नफ़रत है या मोहब्बत है
फिर ज़रूरत है आज़माने की

बअ’द मरने के ले के जाऊँगी
आरज़ू अपने आशियाने की

मैं तो यूँ भी सुलग रही ‘सरहद’
क्या पड़ी आग यूँ लगाने की

वफ़ा और प्रतीक्षा


रास्ते मंज़िलों के बनी ज़िंदगी

रास्ते मंज़िलों के बनी ज़िंदगी
तो कभी रास्ते में मिली ज़िंदगी

रेत सी मुट्ठियों से फिसलती रही
क़तरा-क़तरा पिघलती रही ज़िंदगी

इस ज़माने को पैग़ाम दे जाएगी
चाहे अच्छी हो या फिर बुरी ज़िंदगी

मेरी रहबर भी है मेरी हमराज़ भी
दे रही है नसीहत तभी ज़िंदगी

हर तरफ़ ढेर लाशों के दिखने लगे
हादसों में बनी सनसनी ज़िंदगी

जान ले के हथेली पे चलती हूँ मैं
मौत को जी रही है मिरी ज़िंदगी

आज से तेरे मेरे अलग रास्ते
वो तिरी ज़िंदगी ये मिरी ज़िंदगी

जाने कब से रुकी थी तिरी आस में
आँसुओं में जमी बर्फ़ सी ज़िंदगी

इन हवाओं के तेवर बड़े सख़्त हैं
देख सरहद किधर जाएगी ज़िंदगी

जीवन की यात्रा


उड़े हैं होश मेरे इस ख़बर से

उड़े हैं होश मेरे इस ख़बर से
नहीं है वास्ता अब तेरे दर से

अभी कितनी सज़ाएँ और देगा
न मर जाऊँ कहीं मैं तेरे डर से

बहुत बाक़ी है बरसों का तक़ाज़ा
ज़रा तुम लौट के आओ सफ़र से

भरोसे के यहाँ है कौन क़ाबिल
बशर बेहतर कहाँ है जानवर से

मुझे जीना है इन बच्चों की ख़ातिर
निकलना है ख़यालों के भँवर से

भुला पाई कहाँ माज़ी को ‘सरहद’
नमी आँखों में आरिज़ तर-ब-तर से

डर और ज़िम्मेदारी


उन्हें अब कोई आइना दीजिए

उन्हें अब कोई आइना दीजिए
ज़रा असली सूरत दिखा दीजिए

बिठाए हैं पहरे बहुत आप ने
ज़बाँ पे भी ताला लगा दीजिए

विचारों से ही वो तो बीमार हैं
कोई सोच की अब दवा दीजिए

सज़ा ही सही कुछ तो दे जाइए
वफ़ाओं का अब तो सिला दीजिए

जो इंसाँ से इंसाँ को वाक़िफ़ करे
हमें कोई ऐसा ख़ुदा दीजिए

मोहब्बत है ये कब ये बंधन लगी
भले कितनी सरहद बना दीजिए

सच और आत्मबोध


जिस को लगता है गुम-शुदा हूँ मैं

जिस को लगता है गुम-शुदा हूँ मैं
जान ले मुझ को ज़लज़ला हूँ में

मैं बचाती हूँ बद-दुआओं से
माँ की भेजी हुई दुआ हूँ मैं

खो गया जो घने अँधेरों में
उस उजाले का रास्ता हूँ मैं

मुझ को पहचान मेरे नाज़ उठा
तेरा अपनों से राब्ता हूँ मैं

नफ़रतों ने दिए हैं जो तुम को
ऐसे हर दर्द की दवा हूँ मैं

वक़्त से हार कर न बैठ मुझे
फिर बुला ले तिरी अदा हूँ मैं

मैं सुकूँ हूँ ख़ुशी भी हूँ ‘सरहद’
कौन कहता है ग़म-ज़दा हूँ मैं

आत्मबल और प्रकाश


— सीमा शर्मा ‘सरहद’

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